ज़ख़म 1984 दे : याद रखें, लेकिन उस पीड़ा को बार-बार न जिएँ

 

स्मृतियाँ हमारी लाइब्रेरी बनें, कारागार नहीं।

अतीत को याद रखना ज़रूरी है। लेकिन जब उसकी पीड़ा हमारे वर्तमान पर हावी होने लगे और भविष्य के फैसले डर के साये में होने लगें, तब उन स्मृतियों को जीवन में एक उचित स्थान देना भी ज़रूरी है।

उन्हें मिटाना नहीं है। उनसे मुँह मोड़ना नहीं है। उन्हें इतिहास में सहेजना है—ताकि उनकी सीख हमारे साथ रहे, पर उनकी पीड़ा हर पल हमें बाँधे न रखे।

याद रखने और दर्द का बोझ ढोते रहने में फर्क है।

याद रखना कहता है:
“मुझे पता है कि क्या हुआ था। मैंने उससे सीखा है। ज़रूरत पड़ने पर मैं उस इतिहास से मार्गदर्शन ले सकता हूँ।”

दर्द का बोझ ढोना कहता है:
“मैं हर दिन उसी त्रासदी को फिर जीता हूँ। वही तय करती है कि कल मैं क्या करूँगा, किस पर भरोसा करूँगा और किन संभावनाओं से दूर रहूँगा।”

पीड़ा तब बाधा बनती है, जब वह हमारे इतिहास का एक अध्याय रहने के बजाय हमारी पूरी पहचान बन जाती है। जब हम मानने लगते हैं कि “हमारे साथ ऐसा हुआ था, इसलिए हमें हमेशा डरकर ही जीना होगा,” तब अतीत हमें सिखा नहीं रहा होता—वह हमारे जीवन को चला रहा होता है।

अपनी पीड़ा को सहेजने का अर्थ है:
जो हुआ, उसे पूरी सच्चाई के साथ स्वीकार करना। उससे सीखना। और फिर जीवन को आगे बढ़ने की जगह देना।

जैसे कोई महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ अभिलेखागार में सुरक्षित रहता है—ज़रूरत पर पढ़ने के लिए उपलब्ध, लेकिन हर सुबह हमारी मेज़ पर खुला हुआ नहीं।

जो क़ौम अपने दर्द को सहेजकर आगे बढ़ना नहीं सीखती, वह बीते कल की लड़ाइयों में उलझी रह सकती है।

जो व्यक्ति अपने घावों से बाहर नहीं निकल पाता, उसके फैसले भी भविष्य बनाने के बजाय पुराने आघात से बचने तक सीमित हो सकते हैं।

आगे बढ़ने का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना या न्याय की माँग छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है कि न्याय की तलाश के साथ जीवन, विश्वास और नई संभावनाओं के लिए भी जगह बनी रहे।

भविष्य हमसे भूलने की माँग नहीं करता। वह हमसे इतनी स्वतंत्रता माँगता है कि हमारे कल का हर फैसला बीते हुए डर की मजबूरी न बने।

स्मृति सँजोएँ। सीख साथ रखें। दर्द की ज़ंजीर तोड़ें।

— दविंदर पाल सिंह
drsingh71@gmail.com

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