नैशनल हेराल्ड केस – भाजपा सरकार के बदले और साजिश की कहानी*

आरएसएस और भाजपा शुरू से भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम की सुनहरी विरासत के प्रति अपने मन में विद्वेष रखते रहे हैं। वे 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में निर्मित भारत के शानदार इतिहास, जिसने सारी दुनिया को रास्ता दिखाया, को तोड़ने मरोड़ने और उसे नष्ट करने की साजिशें बुनते रहते हैं। उनके इस अजीब व्यवहार के कारणों को समझना मुश्किल नहीं है। जब कांग्रेस आज़ादी लेने के लिए आर पार की लड़ाई लड़ रही थी, तब आरएसएस और हिंदू महासभा खुलेआम और बड़ी बेशर्मी के साथ अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के साथ मिलीभगत कर भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नाकाम करने की कोशिशें करते रहे। इसलिए जब जब भारत के लोग अपने असाधारण स्वतंत्रता संग्राम को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं, तब तब आरएसएस और भाजपा को लोग बेचैन हो उठते है। नतीजा यह होता है कि वे लगातार ऐसी झूठी अफवाहें फैलाते रहते हैं ताकि लोग महात्मा गांधी, पंडित नेहरू और उन दिनों के अन्य महान नेताओं द्वारा सृजित स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाओं और महिमाशाली प्रतीकों को अपनी स्मृति से बाहर निकाल दें।

नैशनल हेराल्ड अखबार स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा ही महत्वपूर्ण प्रतीक है, जिसने भारत को आज़ाद कराने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि आरएसएस-भाजपा गठजोड़ इसे अपनी पूरी ताकत से नष्ट करने की साजिश रच रहा है।*

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पंडित नेहरू को हमेशा लगता था कि गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए एक स्वतंत्र अखबार की जरूरत है। 1937 में उन्होंने रफी अहमद किदवई, पुरुषोत्तम दास टंडन और कैलाश नाथ काटजू जैसे अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को एक ऐसी ‘नॉन-प्रॉफिट’ कंपनी “एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड” (एजेएल) बनाने के लिए राजी किया, जिसका उद्देश्य अंग्रेजी में नैशनल हेराल्ड, हिंदी में नवजीवन और उर्दू में कौमी आवाज नाम से तीन अखबार निकालना था।

यहाँ यह बताना जरूरी है कि ‘नॉन-प्रॉफिट’ कंपनी में शेयरधारक कंपनी के मुनाफे से एक भी रुपया नहीं ले सकते। सारा मुनाफा कंपनी के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कंपनी में ही निवेश करना पड़ता है। साधारण शब्दों में शेयर धारक किसी नॉन-प्रॉफिट’ कंपनी में अपना समय और श्रम तो दे सकते है, पर वहां से मुनाफ़े का एक रुपया भी नहीं ले सकते और न ही अपने शेयरों को मुनाफ़े पर बेच सकते हैं।

यह अखबार 1938 में शुरू हुए, जिससे स्वतंत्रता संग्राम को बड़ा बल मिला। पंडित नेहरू की अपनी लिखाई में लिखा नारा “स्वतंत्रता खतरे में है, इसे पूरी ताकत से बचाओ” इन अखबारों के मुखपृष्ठ पर छपता था। ये तीनों अखबार जल्द ही ब्रिटिश सरकार, आरएसएस, हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की ‘आंख की किरकिरी’ बन गए, क्योंकि इन्होंने ब्रिटिश इन्डिया और 562 स्वतंत्र रियासतों की जनता को एकजुट कर उन्हें कांग्रेस के झंडे तले लाकर स्वतंत्रता संग्राम में भागीदार बना दिया।

इन अखबारों पर ब्रिटिश सरकार की सारी पाबंदियों और प्रतिबंधों के बावजूद विभिन्नताओं से भरे इस देश में साम्राज्यवाद विरोधी और देशभक्ति की एक सांझी लहर पैदा हुई। इतिहास में पहली बार भावनात्मक रूप से भारत एकजुट होने की दिशा में आगे बढ़ा। आखिरकार स्वतन्त्रता सेनानियों द्वारा दी गईं भारी कुर्बानियों के कारण अंग्रेज़ तो भारत छोड़ कर चले गए, लेकिन आरएसएस के लोग तो यहीं के थे। जब 1947 से पहले तक सैंकड़ों टुकड़ों में बंटा यह देश इतिहास में पहली बार एकजुट हो कर एक संघीय गणतन्त्र बनने की दिशा में अग्रसर हो रहा था तो उस समय आरएसएस और हिन्दू महासभा महात्मा गांथी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल और इन अखबारों की विचारधारा का पुरजोर विरोध कर रहे थे।

जिन लोगों ने स्वयं या जिनके माता-पिता ने स्वतंत्रता संग्राम देखा था, उन्हें आरएसएस के असली चाल, चरित्र और चेहरे की सही पहचान थी। इसलिए आज़ादी के बाद लगभग 50 वर्षों तक जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी को जनता से कोई खास समर्थन नहीं मिला। लेकिन बाद में इन संगठनों ने समाज को धार्मिक आधार पर बांटने में कुछ सफलता पाई। नतीजा यह हुआ कि 1998 से 2004 तक और फिर 2014 से वे सत्ता में आ गए। इसी के साथ स्वतंत्रता संग्राम के कई महान नेताओं और महत्वपूर्ण प्रतीकों एवं प्रतिष्ठित संस्थाओं के खिलाफ बदले और प्रतिशोध की भावना के तहत एक सोची समझी कार्रवाई शुरू हुई। ‘एसोसिएटेड र्जनल्ज़ लिमिटेड” (एजेएल) भी एक ऐसा संस्थान था, जो आरएसएस और भाजपा के रडार पर था।

जैसा कि ऊपर बताया गया है, नैशनल हेराल्ड और बाकी दो अखबार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन का अहम हिस्सा थे। इस कारण कांग्रेस पार्टी का यह दायित्व बन जाता था कि वह सुनिश्चित करे यह अखबार हमेशा छपते रहें ताकि स्वतंत्रता संग्राम की यह शानदार विरासत ज़िन्दा रह पाए। इसलिए जब कभी भी अखबार घाटे में जाते और उन पर अपने कर्मचारियों की या दूसरी देनदारियां खड़ी हो जाती तो कांग्रेस पार्टी एजेएल को आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए बिना ब्याज का कर्ज़ दे दिया करती थी। यह कर्ज़ बढ़ते बढ़ते 90.21 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। फिर 2008 में किन्हीं कारणों से यह अखबार बंद हो गए। उसके बाद कांग्रेस पार्टी में यह विचार बल पकड़ने लगा कि कैसे इन अखबारों को फिर से चलाया जाए।

2010 में श्रीमति सोनिया गांधी, श्री राहुल गांधी और अन्य कांग्रेस नेताओं ने ‘यंग इंडिया लिमिटेड’ नाम की एक ‘नॉन-प्रॉफिट’ कंपनी बनाई। एजेएल कम्पनी ने 90.21 करोड़ के अपने कर्ज को कानून सम्मत तरीके से इक्विटी (शेयरों) में बदल दिया और 90.21करोड़ रुपये मूल्य के शेयर यंग इन्डिया कंपनी को दे कर कर्जमुक्त हो गई।। शेयर ट्रांसफर के बाद यंग इन्डिया कंपनी एजेएल कंपनी की सबसे बड़ी शेयरधारक बन गई। ज्ञात रहे कि यह कर्ज को इक्विटी में बदलने की सामान्य प्रक्रिया थी, जिसका चलन कॉर्पोरेट जगत में एक आम बात है। शेयरों के इस हस्तांतरण के साथ एजेएल कंपनी की कोई ज़मीन, जायदाद या रियल एस्टेट का यंग इन्डिया कंपनी के नाम ट्रांसफर नहीं हुआ। एजेएल कंपनी की सम्पत्तियां कई शहरों में हैं, जो आज भी एजेएल कंपनी के नाम पर ही हैं। यंग इन्डिया कंपनी अपना या एजेएल कंपनी का कोई मुनाफ़ा या संपत्ति शेयरधारकों में नहीं बांट सकती है। यंग इंडिया कंपनी बनाने का उद्देश्य केवल एजेएल कंपनी को कर्जमुक्त करना और अखबारों को फिर से शुरू करना था, न कि किसी व्यक्ति विशेष को फायदा पहुंचाना।

लेकिन दुख की बात यह है कि राष्ट्र की धरोहर इन अखबारों को फिर से चलाने की कांग्रेस पार्टी की कोशिशों के बीच आरएसएस और भाजपा लगातार गंदी राजनीति करते रहे।

1 नवंबर 2012 को भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी, जिनका एजेएल कंपनी से कुछ लेना-देना नहीं था, ने दिल्ली की एक कोर्ट में यंग इन्डिया के शेयरधारकों के खिलाफ निजी शिकायत दायर की। यह केस आज 13 साल बाद भी चल रहा है क्योंकि शिकायतकर्ता खुद ही तरह-तरह के बहाने बना कर अदालती प्रक्रिया को लंबा खींचता जा रहा है।

स्वामी की शिकायत के आधार पर पर्वतन निदेशालय (ईडी) ने 2014 में इस मामले में किसी सम्भावित मनी लॉन्ड्रिंग किए जाने की जांच शुरू की। कुछ समय की जांच के बाद ईडी के अधिकारियों ने स्वयं ही यह सिफारिश की कि यह केस बंद कर देना चाहिए क्योंकि इस केस में कोई पैसा ट्रांसफर ही नहीं हुआ था। यह केवल कर्ज़ को शेयरों में बदलने का मामला था, जो देश के कानून के मुताबिक हुआ था। इसलिए मनी लॉन्ड्रिंग का कोई आरोप लगाया ही नहीं जा सकता था।

लेकिन मोदी और शाह की मंशा साफ़ नहीं थी। वे जानते थे कि देश में सिर्फ राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ही उनके संविधान-विरोधी, सांप्रदायिक और अमीर पोषक एजेंडे का डटकर मुकाबला कर सकते है। इसलिए उन्होंने केन्द्रीय एजेन्सियों का दुरुपयोग कर श्री राहुल गांधी को परेशान करने और डराने, धमकाने की हरसंभव कोशिश की।

सरकारी दबाव में ईडी ने कुछ साल बाद फिर से उसी केस की जांच शुरू कर दी, जिसे बंद करने की सिफारिश वह बहुत पहले ही कर चुकी थी। सख्त जांच करने के सरकारी दबाव के चलते जून 2022 में श्री राहुल गांधी से 5 दिनों में 50 घंटे से ज्यादा समय तक गहन पूछताछ की गई। इसके अलावा श्रीमति सोनिया गांधी से 3 बार और श्री मल्लिकार्जुन खड़गे से भी पूछताछ की गई। कुछ समय बाद आनन फानन में एजेएल कंपनी की संपत्तियां जब्त कर ली गई। यह सब “सरकार द्वारा प्रायोजित उत्पीड़न” था और ईडी का अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्दियों को डराने के लिए दुरूपयोग था, जिसका उद्देश्य भारत के विपक्ष की आवाज को दबाना था। सरकार की इस मनमानी कार्यवाई से लोगों को भारत के लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरे के बारे में पता चला।

अप्रैल 2025 में ईडी ने 988 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाकर अदालत में श्रीमति सोनिया गांधी, श्री राहुल गांधी, श्री सैम पिट्रोडा और अन्य नेताओं के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल कर दी, जबकि वास्तव में एक भी रुपया भी इधर से उधर नहीं हुआ था।

16 दिसंबर 2025 को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू अदालत के विशेष जज विशाल गोगने ने यंग इन्डिया के शेयरधारकों के विरुद्ध दायर की गई ईडी की चार्जशीट खारिज कर दी और इसका संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। इस फ़ैसले से आरएसएस और भाजपा द्वारा नैशनल हेराल्ड अखबार और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के विरूद्ध रची जा रही साजिशों की पोल खुल गई।

इन सब के बावजूद भी मोदी सरकार की बदले की भावना थमने का नाम नहीं ले रही है। उन्होंने ईडी से कह कर विशेष जज के फ़ैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में एक अपील दायर करवाई है।

देश के लोगों में इस बात का पूरा विश्वास हैं कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की अटूट हिम्मत, ताकत और समझदारी के चलते भाजपा सरकार और उसकी सरकारी एजेन्सियों का यह उत्पीड़न और अत्याचार उन्हें कभी भी दबा नहीं पाएगा और वह भारत के संविधान और लोकतंत्र के हक में अपनी पुरज़ोर आवाज़ उठाते रहेंगे। लेकिन, इस सब के बावजूद यह तो पक्का है कि मोदी सरकार की स्वतंत्रता संग्राम के महान प्रतीकों और अपनी राजनीतिक प्रतिद्वन्दी कांग्रेस पार्टी के नेताओं खास तौर पर श्री राहुल गांधी के प्रति गहरे विद्वेष और बदले की भावना से की गई अवांछनीय एवं निन्दनीय कार्यवाहियों को आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रखेंगी। वह यह भी याद रखेंगी कि कैसे प्रतिशोध की भावना से भरी एक सरकार ने अपनी सारी ताकत और सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग किया, और फिर भी वह एक सच्चे और ईमानदार कांग्रेसी नेता को दबा और झुका नहीं सके, क्योंकि उसमें महात्मा गांधी का नैतिक साहस, पंडित नेहरू की समझ और सरदार पटेल का मजबूत इरादा मौजूद था।

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