चंडीगढ़। कला एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में साहित्य अकादमी, दिल्ली और अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त आयोजन में 2 और 3 नवंबर को दिल्ली के विष्णु दिगंबर मार्ग स्थित हिंदी भवन में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी का विषय ‘मातृस्वरूप, मातृभाव और मातृभूमि : वंदे मातरम् और भारतीय राष्ट्रीय चेतना का अभ्युदय’ था।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में चंडीगढ़ के साहित्यकार, लेखक, कवि एवं चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के पूर्व सचिव राजेश आत्रेय ने भाग लेकर ट्राईसिटी का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने ‘वंदे मातरम् : मातृभूमि की कल्पना’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
राजेश आत्रेय ने कहा कि जन्म देने वाली माता और मातृभूमि दोनों समान रूप से आदरणीय हैं। जिस प्रकार हम अपनी जन्मदात्री मां के प्रति किसी भी तरह की गलत बात सहन नहीं कर सकते, उसी प्रकार मातृभूमि के प्रति भी सम्मान और समर्पण का भाव रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इसी भूमि पर हमारा जन्म होता है, यही हमारा पालन-पोषण करती है और अंततः पंचतत्वों से निर्मित हमारा शरीर इसी मिट्टी में विलीन हो जाता है। इसलिए ‘वंदे मातरम्’ मातृभूमि की उपासना और वंदना का प्रतीक है।
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी शासन के पास स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए लाठियां, बंदूकें, कठोर कानून और अत्याचार के अनेक तरीके थे, लेकिन क्रांतिकारियों के होंठों पर केवल दो शब्द ‘वंदे मातरम्’ होते थे। इसी मंत्र का उद्घोष करते हुए अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
उन्होंने कहा कि आजाद भारत में भी युवाओं को इस मंत्र की शक्ति और उसके भाव को समझना होगा तथा मातृभूमि की अखंडता की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना होगा। इस अवसर पर उन्होंने अपनी स्वरचित कविता के माध्यम से उपस्थित श्रोताओं, विशेषकर नई पीढ़ी को मातृभूमि के प्रति प्रेम, सम्मान और समर्पण की भावना से प्रेरित किया।
