जगह-जगह पूजा-पाठ, यज्ञ-अनुष्ठान, जप-तप होते हैं लेकिन फिर भी मानव मंदिर में मुर्दा-मांस डाल कर इसको गंदा करने के कारण इन्सान की बुद्धि नहीं काम करती है

 

किसी की मदद करके उससे कोई इच्छा ना रखो तो वह परोपकार कहलाता है और जो मनुष्य, इंसान से भगवान बन जाता है, वह परमार्थी का करता है

नयागाँव, मोहाली (पंजाब) लाखों लोगों को शाकाहारी, सदाचारी और नशामुक्त जीवन की राह दिखाकर सम्पूर्ण मानवता को आध्यात्मिक जागरण का संदेश देने वाले, जीते-जी ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताने वाले इस समय के सन्त सतगुरु बाबा उमाकान्त जी महाराज ने कहा कि धर्म तो एक ही है जिसके पालन के लिए सबको कहा गया। सत्य बोलो, हिंसा-हत्या मत करो, सेवा और परोपकार करो, यही धर्म है।
अभी आपने तकलीफों को क्या देखा है? तकलीफें तो आगे आएंगी। अभी तक जो आपने नहीं देखा, आगे ऐसी-ऐसी मुसीबतें आ रही हैं, “आगे मुसीबतें बड़ी-बड़ी” लेकिन जो धर्म को धारण करेगा, खराब समय में उसकी रक्षा हो जाएगी।
जो भजनानंदी हो जाएगा, ध्वन्यात्मक नाम जो वक्त गुरु से नामदान के समय मिलता है, उस नाम की डोर को पकड़ लेगा, वह तो सतयुग को देखेगा और नहीं तो सतयुग आने से पहले ही बच्चा तेरा कचूमर निकल जाएगा।

स्वार्थ और परमार्थ में क्या अंतर होता है

जो मनुष्य हैवान से इन्सान बन जाता है और इन्सान से भगवान बन जाता है, वह परमार्थी काम करता है। जानवर परमार्थ नहीं कर सकते हैं, वे तो दूसरे का छीनकर खा लेते हैं लेकिन अपना नहीं खिला सकते हैं क्योंकि उनके पास बुद्धि नहीं होती है।
मनुष्य के पास ही बुद्धि होती है और इसीलिए वह परोपकार कर सकता है, दूसरे की मदद कर सकता है। बहुत से लोग परोपकार करते हैं; भूखे को रोटी खिलाते हैं, प्यासे को पानी पिलाते हैं, किसी के पास कपड़ा नहीं है तो कपड़ा दे देते हैं, किसी गरीब की मदद कर देते हैं, जो करने लायक है। इन्सान अगर दूसरे की मदद करके उससे कुछ इच्छा रखता है तो वह परोपकार नहीं बल्कि स्वार्थ होता है। लेकिन अगर किसी की मदद कर देता है और उससे कोई इच्छा नहीं रखता है तो वह परोपकार होता है।

मां के पेट में बच्चे को भगवान द्वारा क्या हिदायत दी जाती है

बहुत यज्ञ, जप-तप हो रहा है लेकिन जो उपदेश नानक साहब, कबीर साहब, गुरु महाराज और अन्य सन्त देकर के गए उसका लोग पालन नहीं कर रहे हैं। प्रवचन तो बहुत होते हैं, जगह-जगह अनुष्ठान होते हैं लेकिन फिर भी इंसान की बुद्धि नहीं काम करती है और उसका कारण यह है कि भगवान ने इन्सान को मां के पेट में जो हिदायत दी थी कि तू इस मानव मंदिर को गंदा मत करना, इसके अंदर मुर्दा-मांस मत डालना क्योंकि अगर तू कोई भी गंदी चीज इसके अंदर डालेगा और उसी का खून बनेगा तो तेरी बुद्धि खराब हो जाएगी। अब चूंकि रग-रग में वही गंदा खून है, तो उसी शरीर से पूजा-पाठ करने पर भी लोगों को फायदा नहीं होता है।

मुसीबत में आप दस बार ‘जय गुरु देव’ नाम बोलोगे तो कोई ना कोई मददगार आ जाएगा

परम् पूज्य बाबा उमाकान्त जी महाराज ने बताया कि नाम दो प्रकार का होता है—वर्णनात्मक और ध्वन्यात्मक। इस समय का वर्णनात्मक, जीवंत नाम ‘जय गुरु देव’ है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा और विश्वास के साथ ‘जय गुरु देव’ नाम का स्मरण करने से मनुष्य की अनेक परेशानियां दूर हो सकती हैं। इसलिए सुबह-शाम एक घंटा ‘जय गुरु देव’ नामध्वनि का अभ्यास स्वयं करें और परिवार के लोगों से भी करवाएं।
पूज्य महाराज ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी मुसीबत में फंस जाए तो सच्चे मन से ‘जय गुरु देव’ नाम का स्मरण करे। दस बार भी इस नाम का जाप करने पर प्रभु की कृपा से किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य मिलती है।
सत्संग में नए लोगों को नामदान प्रदान करते हुए उन्होंने बताया कि ध्वन्यात्मक नाम आत्मा के कल्याण का साधन है। नामदान लेने के लिए घर-परिवार, जमीन-जायदाद, जाति या धर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। व्यक्ति अपने सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए शाकाहारी, नशामुक्त और चरित्रवान जीवन अपनाए तथा प्रतिदिन साधना के लिए समय निकाले। यही मानव जीवन को सफल बनाने का मार्ग है।

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