“जब देश गरीब था, तब पेंशन मिलती थी, अब डंका बज रहा है तो घंटा मिल रहा है”: एडवोकेट विवेक हंस गरचा

 

विधवा को पेंशन के लिए इंतजार, बेरोजगार को रोजगार का इंतजार और कर्मचारी को बुढ़ापे की सुरक्षा का इंतजार—फिर किस बात का विकास ?
चंडीगढ़, 17 अक्टूबर 2026:
आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, नौजवान क्रांतिकारी सेवा दल, एडवोकेट विवेक हंस गरचा ने सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों और पेंशन व्यवस्था पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि आज देश में विकास का डंका बजाने में सरकारें पीछे नहीं हैं, लेकिन जब बात आम आदमी के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा की आती है तो वही जनता खाली हाथ दिखाई देती है।

एडवोकेट विवेक हंस गरचा ने कहा, “जब देश गरीब था, तो लोगों को पेंशन मिलती थी, अब डंका बज रहा है तो घंटा मिल रहा है।”

उन्होंने कहा कि सरकारों को जनता को आंकड़ों और नारों से प्रभावित करने के बजाय यह जवाब देना चाहिए कि महंगाई के इस दौर में बुजुर्ग, विधवा, दिव्यांग और बेसहारा नागरिक कितनी पेंशन में सम्मान से जीवन जीएं?

उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकारें देश की आर्थिक मजबूती और विकास की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, दूसरी तरफ लाखों परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा आज भी बड़ा सवाल बनी हुई है।

एडवोकेट गरचा ने सरकार के सामने स्पष्ट मांगें रखते हुए कहा:

विधवा को सम्मानजनक विधवा पेंशन चाहिए—सिर्फ कागजों में योजना नहीं।

बुजुर्ग को पर्याप्त वृद्धावस्था पेंशन चाहिए—बार-बार दफ्तरों के चक्कर नहीं।

बेरोजगार युवा को बेरोजगारी भत्ता और रोजगार चाहिए—सिर्फ भाषण और आश्वासन नहीं।

दिव्यांग नागरिक को पर्याप्त दिव्यांग पेंशन और सरकारी सहायता चाहिए—सहानुभूति के शब्द नहीं।

एकल महिलाओं और बेसहारा नागरिकों को मजबूत सामाजिक सुरक्षा चाहिए—औपचारिकताएं नहीं।

सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन भी बहाल हो
एडवोकेट विवेक हंस गरचा ने कहा कि वर्षों तक सरकारी सेवा करने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने मांग की कि सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन व्यवस्था (OPS) की बहाली पर ठोस और सकारात्मक निर्णय लिया जाए।

उन्होंने कहा, “जिस कर्मचारी ने अपनी जवानी सरकार और जनता की सेवा में लगा दी, उसे बुढ़ापे में अपने भविष्य की चिंता क्यों करनी पड़े ? कर्मचारी कोई बोझ नहीं है—वह व्यवस्था की रीढ़ है।”

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार के पास बड़े-बड़े प्रोजेक्ट, प्रचार और योजनाओं के लिए संसाधन हैं, तो जनता की सामाजिक सुरक्षा और कर्मचारियों की पेंशन के लिए मजबूत व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती ?

“डंका नहीं, हिसाब चाहिए”
एडवोकेट विवेक हंस गरचा ने कहा कि अब जनता सिर्फ नारों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। जनता पूछ रही है—

बुजुर्ग की पेंशन कितनी बढ़ी ?
विधवा की आर्थिक सुरक्षा कितनी मजबूत हुई ?
युवा को रोजगार कितना मिला ?
दिव्यांग को कितनी सहायता मिली ?
और सरकारी कर्मचारी के बुढ़ापे की सुरक्षा का क्या हुआ ?

उन्होंने कहा कि विकास का असली पैमाना बड़े-बड़े होर्डिंग और भाषण नहीं, बल्कि आम नागरिक के घर में आर्थिक सुरक्षा और सम्मान है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि सभी सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि को महंगाई के अनुरूप बढ़ाया जाए, पेंशन का भुगतान समय पर किया जाए, पात्र लाभार्थियों को बिना अनावश्यक कागजी कार्रवाई के लाभ दिया जाए तथा सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।

एडवोकेट विवेक हंस गरचा ने चेतावनी भरे राजनीतिक अंदाज में कहा :

“जनता को डंका सुनाने के बजाय जनता की आवाज सुनिए।
गरीब को भाषण नहीं, सहारा चाहिए।
बुजुर्ग को वादा नहीं, पेंशन चाहिए।
युवा को नारा नहीं, रोजगार चाहिए।
कर्मचारी को आश्वासन नहीं, बुढ़ापे की सुरक्षा चाहिए।
अब डंका नहीं—जनता को अपने हक का हिसाब चाहिए।”

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