सीएजी और केंद्र सरकार की कार्यशैली तथा नीतिगत फैसलों में तालमेल की कमी, भ्रष्ट आईएएएस एवं अधीनस्थ अधिकारियों का दबदबा कायम

Chandigarh

सरकार का भ्रष्टाचार उजागर करने वाले सीएजी के अफसरों के ख़िलाफ़ वित्तीय अनियमितता, छेड़छाड़-दुष्कर्म, रिश्वतखोरी, विभागीय परीक्षाओं में धांधली, डेपुटेशन तथा म्यूचुअल ट्रांसफर के नाम पर लाखों रुपए की उगाही, करोड़ों की राशि का गबन जैसी घटनाएं बहुत आम हो चुकी हैं। अभी कुछ महीने पूर्व ही विभाग के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ कनिष्ठ अधिकारियों ने शिकायत दर्ज की थी जिसमें सीएजी के प्रधान निदेशक (कार्मिक) विशाल देशाई की संलिप्तता उजागर हुई थी। विभागीय परीक्षा में धांधली के कारण बहुत बड़े स्तर के अधिकारी की लापरवाही का प्रकरण भी सामने आ चुका है। सीएजी मुख्यालय के ही अधिकारी का महिला सहकर्मियों के साथ अन्य विभिन्न मामलों, अभद्रता, दुर्व्यवहार में संलिप्तता रही है। विभाग के फील्ड कार्यालयों में विकास का आलम यह है कि जहाँ जरूरी सुविधाएं तक नहीं हैं उन कार्यालयों को देखने वाला कोई नहीं है जबकि यदि स्पाउज सीपीडब्ल्यूडी में कार्यरत इंजीनियर हो तो फर्श पर लगी अच्छी खासी टाइलों-ग्रेनाईट पत्थरों को कार्यालय में तैनाती की तिथि से एक साल के भीतर तोड़कर नए लगवाए जा सकते हैं वह भी ईमानदारी का चोला ओढ़कर, जिसका उदाहरण तृप्ति गुप्ता जैसी दबंग आईएएएस हैं जिन्होंने एक ही परिसर में कार्यरत अपने समकक्ष पर फर्नीचर संबंधित भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर सीएजी के विजिलेंस टीम को भी सीसीटीवी फुटेज देने से इंकार कर दिया। जिसके बाद विजिलेंस ने अपने तरीके से काम किया। वर्ष 2025 के दौरान भ्रष्टाचार में संलिप्त अनेक अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायत मिलने पर सरकार ने कार्यवाही करते हुए उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति के द्वारा बाहर का रास्ता भी दिखाया है। यहाँ तक कि तृप्ति गुप्ता का स्थानांतरण आदेश भी जारी हुआ जिसे भारी रकम देकर रुकवाया गया है। इस बात पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है कि भ्रष्टाचार निवारण हेतु देश में अनेक एजेंसियाँ हैं जिनमें स्वयं सीएजी का संस्थान शामिल है। सीएजी सरकार द्वारा निर्धारित नियमों की अनुपालना की स्थिति की ही समीक्षा करता है जो कि आईएएडी के कर्मचारियों पर भी लागू होता है। सेवा शर्तें और भर्ती नियम में बहुत बड़े फर्क होने के बावजूद इस विभाग के ऐसे अनेक संवर्ग हैं जिनके भर्ती नियम संविधान के अनुच्छेद 309 के अनुकूल नहीं हैं। आईएएएस के भर्ती नियमों से सिद्ध होता है कि केवल अनुच्छेद 148(5) के तहत भर्ती नियम बनाने की व्यवस्था नहीं है लेकिन आए दिन डीओपीटी पर सीएजी अधिकारियों द्वारा दबाव बनाए जाने के कारण आईएएडी के भर्ती नियम अधर में लटक रहे हैं। इसी प्रकार राजभाषा विभाग से पृथक होने पर आईएएडी के राजभाषा संवर्ग के कर्मियों के लिए डीओपीटी के मानक भर्ती नियम के अनुसार रिक्रूटमेंट रूल्स बनाना अनिवार्य है किंतु प्रशासनिक विफलताओं के करण मानक भर्ती नियम में दर्ज राजभाषा के सभी पदों के लिए पृथक भर्ती नियम तीस वर्षों से भी अधिक बीत जाने पर भी नियमानुकूल नहीं बनाया गया जिसपर कैट एर्नाकुलम द्वारा स्वतः संज्ञान भी लिया गया था। यह दयनीय स्थिति उस राजभाषा कैडर की है जिसे स्वयं सरकार ने अनुच्छेद 343 से 351 तक निर्धारित संवैधानिक प्रावधानों तथा दायित्वों की पूर्ति के लिए बनाया है। यहाँ तक कि डीओपीटी और नोडल एजेंसियों पर सीएजी मशीनरी के अनैतिक दबाव के कारण सामान्य संवर्ग के कर्मचारियों में घुटन होने लगी है। इसकी वजह से राजभाषा संवर्ग के अनेक कर्मचारी डेपुटेशन पर अन्य विभागों में जाने को तैयार बैठे हैं लेकिन वे डेपुटेशन के लिए सीएजी मुख्यालय को मुँहमांगा रकम देने में असमर्थ हैं। एक ओर जहाँ राजभाषा संवर्ग के कार्मिक अनियमित स्थानांतरण झेल रहे हैं वहीं दूसरी ओर राजभाषा संवर्ग का कार्य देख रहे फील्ड ऑफिस से विशेष भुगतान पर बुलाए गए कुमार माधव और अनुराग प्रभाकर जैसे अधिकारी 12 वर्ष से अधिक अवधि डेपुटेशन पर ही बिताने और वापसी हेतु रिलीविंग ऑर्डर निकलने के बावजूद सीएजी मुख्यालय से हिलने का नाम नहीं ले रहे जो भ्रष्टाचार के हद को सिद्ध करता है। कई अधिकारी तो सेवानिवृत्ति की तिथि तक सीएजी मुख्यालय में पेड डेपुटेशन पर प्रसादपर्यंत डटे रहे हैं जो कि स्थानांतरण नीति के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों के प्रति गंभीरता की कमी को दर्शाता है। जबकि राजभाषा कर्मियों के प्रति दुर्भावना के कारण इस कैडर में नियुक्त कर्मचारियों के स्थानांतरण विकल्पों को न सिर्फ़ नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है बल्कि जानबूझकर स्थानांतरण आदेश को देरी से जारी किया जाता है ताकि हार्ड स्टेशनों पर स्थानांतरित राजभाषा कर्मचारियों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित दो वर्ष के कार्यकाल को बढ़ाया जा सके क्योंकि हार्ड स्टेशनों पर स्थानांतरित ऐसे कर्मचारियों के उन हार्ड स्टेशनों पर कार्यकाल समाप्ति के निर्धारण के लिए सीएजी मुख्यालय द्वारा पदस्थापना की तिथि के बजाय 31 दिसम्बर की तिथि तय की जाती है और आदेश जनवरी-फरवरी में मनमाने ढंग से निकाले जाते हैं। जबकि सीएजी कार्यालय में आजीवन पेड डेपुटेशन वाले कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है कि उनके लिए हार्ड स्टेशनों पर तैनाती की जाए। यानी डेपुटेशन के लिए भाषा संबंधी कोई पाबंदी नहीं है, पर हार्ड स्टेशन पर तैनाती के नाम पर इन्हें भाषा संबंधी दिक्कतें आती हैं, चूँकि नीति निर्माता और प्रस्तावक यहाँ के एएओ और एसएओ स्तर के अधिकारी बने हुए हैं इसलिए इनकी सुविधाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है। शीर्ष स्तर के अधिकारी राजभाषा कैडर की अनियमितताओं से अवगत होते हुए भी दूरी बनाते हैं जिसकी वजह से कर्मचारियों को न्यायालय के शरण में जाना पड़ा है। लेकिन मुख्यालय के दबंग अधिकारियों के प्रेशर के कारण कुछ अधिकारियों को केस वापस लेना पड़ता है। स्वच्छ छवि के बड़े स्तर के अधिकारी इन संवेदनशील विषयों पर ज़्यादा ध्यान इसलिए नहीं देते कि कहीं लॉबी उनके पीछे पड़के उनका ही पत्ता साफ़ न कर दे। इससे सीएजी महकमे में भ्रष्टाचार के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि अकेले 2025 में ही सीएजी के 10 से अधिक आईएएएस स्तर के बड़े-बड़े अधिकारियों पर गाज़ गिर चुकी है। इस विभाग में मुख्य संवर्ग से हटकर काम करने वाले सामान्य संवर्ग के कर्मचारियों में सीएजी मुख्यालय के अधिकारियों के ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार के कारण भारी रोष व्याप्त है क्योंकि उनकी जायज मांगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है

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