दुनिया की सभी शासन व्यवस्थाओं में लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह उस मूल सिद्धांत पर आधारित है कि सरकार जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए होती है। लेकिन इस व्यवस्था में भी एक बड़ा खतरा छिपा है। जब बहुमत का शासन ही सब कुछ बन जाता है, तो लोकतंत्र बहुसंख्यकवाद में बदल जाता है। यह एक ऐसी तानाशाही व्यवस्था में तबदील हो जाता है, जो केवल बहुमत के हित में काम करती है, न कि आम जनता, अल्पसंख्यकों, गरीबों और कमज़ोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए। यही काम नरेंद्र मोदी की सरकार 2014 से धीरे-धीरे, पर बड़ी चालाकी से कर रही है।
2014 के बाद के भारतीय लोकतंत्र लगातार कमज़ोर होने का संकेत दे रहा। मोदी सरकार द्वारा संवैधानिक लोकतंत्र को जानबूझकर एक योजनाबद्ध तरीके से बहुसंख्यकवाद में बदला जा रहा है। मोदी सरकार ने बार-बार यह दिखाया है कि उसे संवैधानिक प्रावधानों को धत्ता बता कर, स्वतंत्र संस्थाओं को कमज़ोर कर के, देश की बुनियादी संवैधानिक संरचना को अपने चुनावी फायदे के लिए तोड़ने मोड़ने से कोई गुरेज़ नहीं है। 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पेश किया गया परिसीमन विधेयक मोदी सरकार की इसी खतरनाक सोच की एक बेशर्म मिसाल थी।
भारत के संविधान निर्माता यह तो अच्छी तरह जानते थे कि इतने विशाल और विविधताओं से भरे देश में केवल बहुमत के बल पर शासन नहीं चल सकता। वे समझते थे कि जो लोग सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ वोट देते हैं, उनके अधिकारों की रक्षा करना उतना ही ज़रूरी हैं जितना कि सरकार के समर्थकों का। संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 यह तय करते हैं कि लोकसभा की सीटें जनसंख्या के अनुपात में राज्यों को दी जाएं और हर जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण हो। 1950 में यह प्रावधान कागज़ पर बिल्कुल सही और लोकतांत्रिक लगता था। लेकिन बाद की परिस्थितियों ने बता दिया कि ऐसा नहीं था।
1970 के दशक तक आते-आते भारत के संघीय ढांचे में विभाजन की एक दरार ख़तरनाक ढंग से पैदा हो चुकी थी। दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक ने परिवार नियोजन की राष्ट्रीय अपील पर जिम्मेदारी से अमल किया था। उन्होंने महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुधारों में भारी निवेश करके जन्म दर को काफी नीचे ला दिया था। उत्तर के राज्य इन सभी मामलों में बहुत पीछे रहे। 1970 के दशक में ही यह कड़वी सच्चाई सामने आ गई थी कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने मानव विकास में निवेश कर अपने लोगों का जीवन स्तर सुधारा था और इसके विपरीत वह राज्य पुरस्कृत होंगे जिन्होंने परिवार नियोजन को नकारा और लोगों का जीवन स्तर नही सुधारा।
इंदिरा गांधी और वाजपेयी ने दलगत राजनीति से ऊपर राष्ट्रहित को रखा
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस बुनियादी विसंगति को पहचान कर एक सैद्धांतिक फैसला लिया। 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन के ज़रिए उनकी सरकार ने तय किया कि वर्ष 2001 तक हर राज्य को 1971 की जनगणना के आधार पर मिली लोकसभा सीटें यथावत रहेंगी। यह बुद्धिमत्तापूर्ण राजनीतिज्ञता की निशानी थी। इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक लाभ को दरकिनार करते हुए राष्ट्रीय एकता और संघीय न्याय को तरजीह दी । वे जान चुकीं थीं कि भारी असमानता वाले राज्यों के भारत देश में केवल संख्याबल ही राजनीतिक शक्ति का पैमाना नहीं हो सकता। लेकिन 2001 तक आते आते उत्तर और दक्षिण के बीच डेमोग्राफिक खाई और भी गहरी हो चुकी थी। वाजपेयी सरकार ने भी राष्ट्रीय कर्तव्य को पहचाना और 84वें संवैधानिक संशोधन के ज़रिए परिसीमन पर रोक को आगे बढ़ाया। एक बार फिर राष्ट्रीय हित ने दलगत हिसाब-किताब पर विजय पाई गई। इंदिरा और अटल, दोनों नेता अलग-अलग राजनीतिक परंपराओं से आते थे, लेकिन दोनों ने अपनी पार्टी से ऊपर देश को रखा। यही वह कसौटी है जिस पर नरेंद्र मोदी को भी परखा जाना चाहिए और जिस पर वे बुरी तरह से और शर्मनाक रूप से विफल होते दिखाई दे रहे हैं।
मोदी का विश्वासघात: राष्ट्रीय एकता पर भारी पड़ी चुनावी महत्वाकांक्षा
अप्रैल 2026 में, जब स्वतंत्र भारत के इतिहास में उत्तर और दक्षिण के बीच डेमोग्राफिक फासला सबसे ज़्यादा था, मोदी सरकार ने ठीक वही किया जिसे करने से देशहित में इंदिरा गांधी और वाजपेयी ने करने से इनकार किया था। उन्होंने पूरे देश में अंतरराज्यीय परिसीमन कराने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पेश कर दिया। और यह किसी नई संवैधानिक जनगणना के आधार पर नहीं, बल्कि पुरानी पड़ चुकी 2011 की जनगणना के आधार पर किया। लोकसभा को 543 से बढ़ाकर 850 सीटें करने का प्रस्ताव था। यह एक ऐसा कदम जो जनसंख्या के अनुपात में सीटें बांटने की वजह से दक्षिणी राज्यों को राजनीतिक हाशिए पर धकेल देता और उत्तर भारत के राज्यों को ज़बरदस्त राजनीतिक ताकत प्रदान करता। स्पष्ट है कि मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय एकता को चुनावी जीत की बलिवेदी पर कुर्बान किया जा रहा था।
महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन का छल कपट
16 अप्रैल 2026 को एक विशेष संसदीय सत्र में एक साथ तीन विधेयक पेश किए गए। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक 2026। इन्हें बड़ी चालाकी के साथ संसद में महिला आरक्षण को लागू करने वाले कानून के रूप में पेश किया गया। यह राजनीतिक धोखे की पराकाष्ठा थी। महिला आरक्षण विधेयक तो 2023 में ही नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 106वें संवैधानिक संशोधन के रूप में सर्वसम्मति से पास हो चुका था। सबसे अहम बात यह है कि मोदी सरकार ने लगभग तीन साल तक इसकी अधिसूचना जारी नहीं की और इसे ठंडे बस्ते में डाले रखा। अप्रैल 2026 में विपक्ष के दबाव में आकर ही उन्हें इसे अधिसूचित करना पड़ा। अगर भाजपा को वास्तव में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की फिक्र होती तो उनके पास तीन साल का वक्त था। उन्होंने कुछ नहीं किया। क्योंकि महिलाओं को आरक्षण देने का उनका कभी भी इरादा ही नहीं था। आरक्षण तो बस एक आवरण था। परिसीमन कर के राजनीतिक लाभ प्राप्त करना हमेशा से उनका असली मकसद था जिसे वह हर कीमत पर हासिल करना चाहते थे।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस धोखे को बेनकाब करते हुए साफ कहा “मोदी सरकार ने महिलाओं के नाम पर एक असंवैधानिक चाल चलकर संविधान को तोड़ने की कोशिश की”। उन्होंने इसे एक “राष्ट्रविरोधी कृत्य” बताया और कहा कि यह भाजपा को फायदे पहुचाने के लिए देश का चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश है।
मोदी सरकार ने संसद को यह कहकर और गुमराह किया कि हर राज्य को सीटों में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी मिलेगी। यह बात विधेयक में कहीं नहीं लिखी थी, इसलिए इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं थी। 131वां संशोधन विधेयक में 850 सीटों की अधिकतम सीमा तय की गई थी, लेकिन सीटों का असली बंटवारा परिसीमन आयोग द्वारा जनसंख्या के अनुपात में किया जाना था। गृह मंत्री अमित शाह के सदन में दिए गए मौखिक आश्वासन वादे के भेष में एक कोरा झूठ था।
कांग्रेस पार्टी और इंडिया गठबंधन ने इस मौके पर डटकर इस षड्यंत्रकारी विधायी मंसूबे को नाकाम कर दिया। अप्रैल 2026 में लोकसभा में परिसीमन संवैधानिक संशोधन विधेयक की करारी हार महज़ एक संसदीय जीत नहीं थी, बल्कि यह भारत के संवैधानिक मूल्यों की प्राण रक्षा थी।
यहां कांग्रेस पार्टी अपनी यह मांग एक बार फिर दोहराती है कि सितंबर 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक को बिना किसी देरी के, बिना किसी परिसीमन या कोई और शर्त जोड़े, तुरंत लागू किया जाए और भाजपा इसे अपनी राजनीतिक चालबाज़ियों का शिकार न बनाए।
परिसीमन भारत के संघीय ढांचे को तोड़ सकता था
उत्तर और दक्षिण भारत के बीच गहरा डेमोग्राफिक अंतर कोई मामूली आंकड़ों का खेल नहीं है। यह एक ऐसी खाई है जो पचास सालों से लगातार चौड़ी होती जा रही है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में प्रजनन दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। दूसरी तरफ तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक ने अपनी प्रजनन दर को राष्ट्रीय औसत के बराबर या उससे नीचे ला दिया है । यह वह मील का पत्थर है जिसे हासिल करने में विकसित देशों को भी पीढ़ियां लग गईं। ऐसे में परिसीमन विधेयक देश के हर राज्य को एक खतरनाक संदेश देता है कि जिम्मेदार और जनहितैषी शासन से आपका प्रदेश के राजनीतिक ताकत से दूर हो जाएगा, और सरकारी नीतियों का पालन करने में विफलता आपको सत्ता के गलियारों में बेलगाम ताकत दिला देगी। यह तो सफलता को सज़ा देना और नाकामी को इनाम देना हुआ।
संघीय ढांचे पर भरोसे को टूटने का ख़तरा
भारत राज्यों का एक संघ है, जो इस संवैधानिक वचन से बंधा है कि हर राज्य को देश के शासन में बराबर की हिस्सेदारी मिलेगी। भारत के संघीय ढांचे की नींव इस अटूट भरोसे पर टिकी है कि किसी भी क्षेत्र को दूसरे क्षेत्र से कम महत्व नहीं दिया जाएगा ।
यदि दुर्भाग्य से मोदी सरकार का परिसीमन बिल पास हो जाता, तो दक्षिण के राज्यों पर हिंदी पट्टी का वर्चस्व हो जाता। हिंदी पट्टी के राज्य ही दक्षिण भारत के करों का बंटवारा, केंद्रीय योजनाओं में उनका हिस्सा, उनके भाषाई अधिकार और उनकी विकास की प्राथमिकताएं, वित्त आयोग के आवंटन, केंद्रीय योजनाओं का वितरण, संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्तियां, संसद का पूरा विधायी एजेंडा, सब कुछ वही तय करते। यह सब कुछ उत्तरी भारत के ऐसे बहुमत के हाथ में होता जिसके हित, प्राथमिकताएं और सांस्कृतिक सोच दक्षिण से बिल्कुल अलग है। ऐसा होने से संघीय ढांचा असंतुलित होकर कमज़ोर हो जाता।
दक्षिणी राज्यों के नेता इस खतरे को लेकर चुप नहीं रहे। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में अलग-अलग विचारधाराओं के नेताओं ने, यहां तक कि जो दल कभी भाजपा का समर्थन करते रहे हैं, उन्होंने भी परिसीमन विधेयक के खतरनाक नतीजों पर गहरी चिंता जताई। जब किसी क्षेत्र में सभी विचारधाराओं के नेता एक साथ एक आवाज़ में बोलें, तो यह राजनीति नहीं बल्कि एक चेतावनी होती है। लेकिन नरेंद्र मोदी ने उस चेतावनी को अनसुना कर अपनी बहुसंख्यकवादी सत्ता को हमेशा के लिए मज़बूत करने का षड्यंत्र करते रहे। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी और इंडिया गठबंधन के पास राष्ट्र हित में परिसीमन बिल के विरुद्ध वोट करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और गहरी साज़िशें
मोदी का परिसीमन का दांव कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है। यह एक सौ साल पुरानी वैचारिक विरासत की एक कड़ी है। भाजपा के वैचारिक आकाओं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा ने ऐतिहासिक रूप से हमेशा अपने साम्प्रदायिक नफ़े नुक्सान को राष्ट्रीय एकता से ऊपर रखा है। हिंदुत्व की इन दोनो संस्थाओं ने आज़ादी से पहले मुस्लिम लीग के साथ मिलकर देश के बंटवारे की त्रासदी को जन्म दिया। 79 साल बाद, वही वैचारिक ज़हर सत्ता की ताकत से लैस होकर भारत के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने, संवैधानिक संस्थाओं को खोखला करने और देश के बहुलवादी लोकतंत्र को बहुसंख्यकवादी तानाशाही में बदलने पर आमादा है।
कांग्रेस पार्टी संघ परिवार के इन हथकंडों को जानती है। उसने मोदी सरकार को यह जता दिया है कि जनसांख्यिकीय बहुसंख्यकवाद और लोकतांत्रिक एकता एक ही चीज़ नहीं हैं। जो सरकार लोकतंत्र को कमज़ोर कर बहुसंख्यकवादी तानाशाही का पोषण करती है वह भारत का निर्माण नहीं कर रही बल्कि उसे बांट रही है।
भारत की जनता जानती है कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार के किसी भी भारत-विरोधी मंसूबे को कामयाब नहीं होने देगी। उसने उन्हें अभी संसद में रोका है। वह उन्हें आगे भी संसद के अंन्दर और बाहर रोकती रहेगी।
राजीव शर्मा, महासचिव एवं मुख्य प्रवक्ता, चंडीगढ़ प्रदेश कांग्रेस
