पंचकूला : इंडियन नेशनल लोकदल के प्रदेश कोषाध्यक्ष एवं पंचकूला शहरी जिलाध्यक्ष मनोज अग्रवाल ने केंद्र सरकार द्वारा रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में पैसों में की गई बढ़ोतरी पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार किसानों की आय बढ़ाने के दावे तो बड़े-बड़े करती है, लेकिन जब किसान की फसल का भाव तय करने की बारी आती है तो बढ़ोतरी बेहद मामूली कर दी जाती है।
उन्होंने कहा कि रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए गेहूं का न्युनतम समर्थन मूल्य केवल ₹25 प्रति क्विंटल यानी 25 पैसे यानी चवन्नी प्रति किलो, जौ का ₹136 प्रति क्विंटल यानी ₹1.36 प्रति किलो, चने का ₹83 प्रति क्विंटल यानी 83 पैसे प्रति किलो और रेपसीड-सरसों का ₹413 प्रति क्विंटल यानी ₹4.13 प्रति किलो बढ़ाया गया है। आरबीआई भी बीस साल पहले चवन्नी अठन्नी चलन से बाहर कर चुका है।
मनोज अग्रवाल ने कहा कि 25 पैसे किलो की बढ़ोतरी को किसान के लिए राहत बताना जमीन की हकीकत से आंखें मूंदने के बराबर है। किसान की खेती में डीजल, खाद, बीज, कीटनाशक, मजदूरी, बिजली और सिंचाई समेत लगभग हर इनपुट की लागत लगातार दबाव में है। ऐसे में सरकार को केवल एम एस पी की घोषणा नहीं, बल्कि यह भी बताना चाहिए कि वास्तविक खेती लागत का आकलन कैसे किया गया।
उन्होंने कहा कि सरकार स्वयं गेहूं की 2027-28 की उत्पादन लागत ₹1,264 प्रति क्विंटल, जौ की ₹1,447, चने की ₹3,751 और रेपसीड-सरसों की ₹3,367 प्रति क्विंटल बताती है।
मनोज अग्रवाल ने सवाल किया कि जब खेती की लागत किसान को वास्तविक बाजार में चुकानी पड़ती है तो MSP तय करते समय किसान की परेशानी को सिर्फ कागजों के आंकड़ों तक सीमित क्यों रखा जा रहा है?
उन्होंने कहा कि किसानों को केवल घोषणाएं नहीं, लागत का वास्तविक हिसाब, लाभकारी भाव और एम एस पी पर प्रभावी खरीद की गारंटी चाहिए। सरकार को किसानों के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि घोषित एम एस पी का कितना हिस्सा वास्तव में किसानों तक पहुंचेगा और कितनी फसल सरकारी एजेंसियां एम एस पी पर खरीदेंगी।
मनोज अग्रवाल ने कहा कि किसान देश का अन्नदाता है, उसे आंकड़ों की बाजीगरी नहीं बल्कि उसकी मेहनत का सम्मानजनक मूल्य चाहिए।
गेहूं का न्युनतम समर्थन मूल्य मात्र 25 पैसे यानी चवन्नी प्रति किलो बढाकर किसानों की लागत का मजाक ? आरबीआई ने भी बीस साल पहले चवन्नी बंद कर दी थी : मनोज अग्रवाल
