भारत में सोलर पैनल पार्ट्स का बाजार 2028 तक दोगुने से अधिक बढ़कर 7.8 अरब डॉलर हो सकता है, बशर्ते क्षमता समय पर विकसित हो और मांग की निश्चित रफ्तार बनी रहे: सीईईडब्ल्यू स्टडी

– भारत में सोलर पैनल पार्ट्स का बाजार सितंबर 2026 के लगभग 3.6 अरब डॉलर से दोगुने से अधिक बढ़कर मार्च 2028 तक लगभग 7.8 अरब डॉलर (2.2 गुना) हो सकता है।
– भारत की कैमिकल इंडस्ट्री के पास देश में ही बैटरी इलेक्ट्रोलाइट बनाने के लिए जरूरी अधिकतर सामग्री पहले से उपलब्ध है, जबकि आज लगभग सारा इलेक्ट्रोलाइट आयात होता है, जो एक सेल की लागत का लगभग 5 प्रतिशत है।
– नियोजित प्लांट के समय पर चालू होने और सुनिश्चित मांग से नई क्षमता अपने खरीदारों तक जल्द पहुंच सकती है।

नई दिल्ली, 05 नवंबर 2026: भारत में सोलर पैनल में लगने वाले पार्ट्स का बाजार सितंबर 2026 के लगभग 3.6 अरब डॉलर (34,200 करोड़ रुपये) से दोगुने से अधिक बढ़कर मार्च 2028 तक 7.8 अरब डॉलर (74,100 करोड़ रुपये) हो सकता है। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की एक नई स्टडी से सामने आई है।

उद्योग में इन पार्ट्स को बिल ऑफ मैटेरियल्स (बीओएम) कहा जाता है, जिसमें सोलर ग्लास, एल्युमिनियम फ्रेम, करंट ले जाने वाले कॉपर रिबन, सेल को सील करने वाली एनकैप्सुलेंट शीट, और पीछे की ओर लगने वाले बैकशीट व जंक्शन बॉक्स शामिल हैं। सोलर सेल को छोड़कर, पैनल का बाकी सब कुछ यही पार्ट्स होते हैं। सितंबर 2026 में भारत की सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 228.5 गीगावाट तक पहुंच गई, और इन पार्ट्स को बनाने वाली कंपनियां अब बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए अपना उत्पादन बढ़ा रही हैं। बैटरी इलेक्ट्रोलाइट पर सीईईडब्ल्यू की एक अन्य स्टडी के साथ यह नई स्टडी नई दिल्ली में आयोजित भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट एंड एक्सपो 2026 में जारी की गई। दोनों स्टडी में पाया गया है कि भारत के पास इन पार्ट्स को बनाने के लिए औद्योगिक आधार मौजूद है। इस क्षमता को बड़े पैमाने पर खरीदारों तक पहुंचाने के लिए प्लांट का समय पर संचालित होना (commissioning) और एक स्थिर मांग का होना जरूरी है, जिसके लिए तकनीकी मानक निर्धारित करने और टेस्टिंग का बुनियादी ढांचा (testing infrastructure) विकसित करने की जरूरत है।

मंत्रिस्तरीय पूर्ण सत्र (Ministerial Plenary) में श्री प्रल्हाद जोशी, केंद्रीय नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री, ने कहा, “2014 में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 2.8 गीगावाट थी; आज यह 172 गीगावाट है। अगर आप सुस्थिर अक्षय ऊर्जा दे सकते हैं, तो उद्योग उसे ही प्राथमिकता देता है: क्योंकि यह स्वच्छ ऊर्जा है, और यह अपेक्षाकृत सस्ती है। जब कहीं पर बाजार होता है, तो वहां पर निवेश होता है; और जब निवेश होता है, तो वहां प्रगति भी होगी।”

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने 2 से 5 नवंबर तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में इस समिट का आयोजन किया है, जिसमें सीईईडब्ल्यू नॉलेज पार्टनर रहा और उसने समिट के चार दिनों के दौरान 14 सत्रों का आयोजन किया। कंपनियों की घोषणाओं से संकेत मिलता है कि अगर प्लांट समय पर चालू हो जाएं तो मार्च 2028 तक भारत अधिकतर पार्ट्स के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है। सितंबर 2026 में देश में इनकी सालाना मैन्युफैक्चरिंग क्षमता ग्लास के लिए 20 गीगावाट से लेकर जंक्शन बॉक्स के लिए 153 गीगावाट तक थी। अगर नियोजित विस्तार समय पर पूरे हो जाते हैं, तो फ्रेम, रिबन और एनकैप्सुलेंट मार्च 2027 तक भारत की लगभग 67 गीगावाट की अनुमानित सालाना मॉड्यूल मांग को पूरा कर सकते हैं, और ग्लास मार्च 2028 तक। जंक्शन बॉक्स पहले से ही यह मांग पूरी कर रहे हैं। बैकशीट इसका अपवाद है: इसके लिए कोई नई क्षमता योजना में शामिल नहीं है, क्योंकि ग्लास-ग्लास मॉड्यूल्स इसकी जगह ले रहे हैं, जो कि एक संकेत है कि मॉड्यूल तकनीक कितनी तेजी से बदल रही है।

खरीदारों का भरोसा जीतना अगला कदम है। स्टडी में बीओएम के सभी पार्ट्स से जुड़े हितधारकों के साथ चर्चा में मॉड्यूल निर्माताओं ने कहा कि अगर लागत और प्रदर्शन आयातित पार्ट्स के बराबर हों, तो वे आयातित उत्पादों की जगह पर इन घरेलू उत्पादों को अपनाने को तैयार हैं। घरेलू क्षमता को इंस्टॉलेशन की रफ्तार के साथ कदम मिलाकर चलना होगा। वित्त वर्ष 2021 से वित्त वर्ष 2026 के बीच, भारत में ग्लास का आयात प्रतिवर्ष 63 प्रतिशत की दर से बढ़ा और 129 मिलियन डॉलर से 1.48 अरब डॉलर पर पहुंच गया। एल्युमिनियम फ्रेम का आयात प्रतिवर्ष 88 प्रतिशत और जंक्शन बॉक्स का आयात 92 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वित्त वर्ष 2026 में, भारत के ग्लास आयात का 66 प्रतिशत और फ्रेम आयात का 70 प्रतिशत चीन से आया, जबकि एनकैप्सुलेंट आयात का 34 प्रतिशत वियतनाम से और 31 प्रतिशत थाईलैंड से आया। घरेलू आपूर्ति तैयार होने से मॉड्यूल निर्माताओं पर कीमतों के उतार-चढ़ाव और दूसरी जगहों के व्यापारिक फैसलों से जुड़े जोखिम में कमी आएगी।

स्थितियां बदलने लगी हैं। चीन ने अप्रैल 2026 में फोटोवोल्टिक निर्यात पर वैट छूट को वापस ले लिया है, और ग्लास, फ्रेम और ईवीए एनकैप्सुलेंट पर भारत के एंटी-डंपिंग शुल्क 2029 तक लागू रहेंगे। इन दोनों से आयात की कुल लागत (landed cost) बढ़ती है। सीईईडब्ल्यू की स्टडी सचेत करती है कि इसका फायदा तभी होगा, जब घरेलू प्लांट समय पर तैयार हो जाएं। इसमें देरी होने पर सोलर मॉड्यूल बनाने की लागत बढ़ सकती है।

क्षमता के साथ-साथ सामर्थ्य भी बनाना होगा। भारतीय निर्माताओं के पास नए प्रकार के उत्पादों में विस्तार करने का अवसर है, जैसे मॉड्यूल की दक्षता बढ़ाने वाले मल्टी-बसबार और रिफ्लेक्टिव रिबन, हेट्रोजंक्शन सेल के लिए लो-टेम्परेचर रिबन, और कंपोजिट फ्रेम। वे अभी भी प्रमुख कच्चे माल का आयात करते हैं। संपूर्ण उद्योग में टेस्टिंग के एक समान मानदंड नहीं होने से प्रत्येक निर्माता अपने तरीके से टेस्टिंग करता है। साथ ही, इन छह पार्ट्स में से किसी के लिए भी पृथक कस्टम्स कोड (हार्मोनाइज्ड सिस्टम क्लासिफिकेशन) नहीं है। आयात कई कोड के तहत होता है, इसलिए भारत के अपने आयात व्यापार के आंकड़े भी केवल सबसे बेहतर अनुमान हैं, और एंटी-डंपिंग शुल्क लागू करना भी मुश्किल होता है।

ऋषभ जैन, फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “भारत ने दिखाया है कि वह बड़े पैमाने पर सोलर मॉड्यूल असेंबल कर सकता है। अगली परीक्षा यह है कि क्या हम इसके पार्ट्स भी बड़े पैमाने पर और अच्छी गुणवत्ता के साथ बना सकते हैं। अच्छी बात यह है कि निवेश की प्रतिबद्धताएं आ चुकी हैं और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं भी तैयार होने जा रही हैं। लगातार निवेश और स्थानीय मांग मिलकर भारत को सोलर बिल ऑफ मैटेरियल्स (बीओएम) के लिए एक वैकल्पिक सप्लाई चेन बना सकते हैं।”

बैटरी के मामले में क्षमता पहले से मौजूद है। इलेक्ट्रोलाइट एक बैटरी सेल की कुल लागत का लगभग 5 प्रतिशत होता है, और यह सेल के प्रदर्शन व सुरक्षा के लिए बहुत अहम होता है। भारतीय कंपनियों ने देश में लगभग 150 गीगावाट ऑवर की सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बनाने की घोषणा की है। सीईईडब्ल्यू के विश्लेषण के अनुसार, भारत को प्रतिवर्ष 60,000 से 90,000 टन इलेक्ट्रोलाइट की जरूरत होगी। सीईईडब्ल्यू की बैटरी स्टडी में, जो बैटरी सेल के पार्ट्स के स्थानीयकरण (localisation) पर सीरीज की पहली स्टडी है, पाया गया है कि इलेक्ट्रोलाइट बनाने का सामर्थ्य भारत की कैमिकल इंडस्ट्री में पहले से मौजूद है। कमी तकनीक की नहीं, बल्कि शुद्धता के मानकों, टेस्टिंग के बुनियादी ढांचे और विशेष उपकरणों की है।

देश में टेस्टिंग लैब होने से मंजूरी मिलने में कई महीने का समय बच सकता है। भारत में बैटरी-ग्रेड इलेक्ट्रोलाइट की जांच के लिए मान्यता प्राप्त घरेलू सुविधाएं सीमित हैं। उत्पादक अपने नमूने दक्षिण कोरिया, जापान और जर्मनी भेजते हैं, जिससे हर मंजूरी में कई महीने लगते हैं और लैब फीस व कूरियर का खर्च अलग से जुड़ जाता है। सीईईडब्ल्यू स्टडी का अनुमान है कि एक घरेलू सुविधा बनाने पर लगभग 1.6 मिलियन डॉलर (15 करोड़ रुपये) का खर्च आएगा।

डॉ. आकांक्षा त्यागी, सीनियर प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “भारत के पास इलेक्ट्रोलाइट मैन्युफैक्चरिंग में एक वैश्विक खिलाड़ी बनने का अनूठा अवसर मौजूद है। इसकी कैमिकल इंडस्ट्री और शोध संस्थानों के पास कच्चे माल, मशीनों, प्रक्रियाओं और प्रतिभा के रूप में क्षमताएं पहले से मौजूद हैं। इनका इस्तेमाल करके इलेक्ट्रोलाइट के व्यावसायिक उत्पादन में शुरुआती बढ़त हासिल की जा सकती है।”

मांग का संकेत दें और मानकों को एक समान बनाएं
उत्पादों की तुलना और उनकी निगरानी को आसान बनाने के लिए, सोलर स्टडी का सुझाव है कि केंद्रीय बजट 2027-28 से पहले हर पार्ट के हर प्रकार के लिए अलग कस्टम्स कोड निर्धारित किए जाएं। इसमें नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई), भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) और उद्योग की ओर से एक समान टेस्टिंग मानक बनाने का भी सुझाव दिया गया है। बैटरी स्टडी ऐसी घरेलू टेस्टिंग लैब बनाने का सुझाव देती है, जिनके प्रमाणपत्र विदेशों में भी मान्य हों। सोलर पार्ट्स की मांग सुनिश्चित करने के लिए, एमएनआरई को सभी छह पार्ट्स को अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (ALMM) के तहत लाना चाहिए, जनवरी 2028 तक इन्हें सूचीबद्ध करना चाहिए और इस व्यवस्था को जनवरी 2029 से लागू करना चाहिए। साथ में, जनवरी 2028 से इनके लिए डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट (Domestic Content Requirement) की शर्त लागू करनी चाहिए। सीईईडब्ल्यू स्टडी का यह भी सुझाव है कि स्थानीय सोर्सिंग के नियम पहले स्वैच्छिक, फिर आंशिक और फिर पूर्ण बनाए जाने चाहिए, जिसे अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ बैटरी कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स, सेल के पार्ट्स के लिए माइलस्टोन से जुड़ी पूंजीगत सब्सिडी (milestone-linked capital subsidy), और ऐसे संयुक्त उद्यम (joint ventures) की सहायता मिले, जिनमें भारतीय कंपनियां जो कुछ भी विकसित करें, उसमें उनका सह-स्वामित्व रहे।

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