चंडीगढ़, 13 अक्टूबर 2025 – पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने ‘ई-जागृति’ राष्ट्रीय उपभोक्ता न्याय पोर्टल की प्रणालीगत और लंबे समय से चली आ रही विफलता को दर्शाने वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर संज्ञान लिया है, और केंद्र सरकार, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC), और चंडीगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग को नोटिस जारी किया है। हाल ही में कानून में स्नातक हुए राजा विक्रांत शर्मा(अधिवक्ता) द्वारा दायर याचिका में दावा किया गया है कि पोर्टल की निष्क्रियता ने उपभोक्ता कानूनी न्याय प्रणाली में एक राष्ट्रव्यापी डिजिटल तालाबंदी कर दी है, जिससे भारत में लाखों उपभोक्ताओं और अधिवक्ताओं को न्याय से वंचित होना पड़ रहा है।
शर्मा द्वारा स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में दायर की गई यह जनहित याचिका उनके प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित है। याचिका में कहा गया है कि जनवरी में चंडीगढ़ उपभोक्ता आयोग में अपनी इंटर्नशिप के दौरान, उन्होंने प्रणाली के कारण होने वाली “व्यापक चुनौतियों और गंभीर कठिनाइयों” को देखा। इसमें आगे बताया गया है कि शर्मा को खुद दो बार, 14 फरवरी 2025 और 31 जुलाई 2025 को, उपभोक्ता मामले ऑफ़लाइन दर्ज करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि अनिवार्य ई-फाइलिंग प्रणाली चालू नहीं थी।
याचिका भारत में डिजिटल उपभोक्ता न्याय पारिस्थितिकी तंत्र के पूर्ण पतन पर प्रकाश डालती है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पिछले ‘कॉनफोनेट'(confonet) और ‘ई-दाखिल'(E-daakhil) पोर्टलों के बंद होने के बाद से, नई ई-जागृति(E-jagriti) पोर्टल “बड़े पैमाने पर निष्क्रिय” रही है। इसमें दावा किया गया है कि इसने “उपभोक्ता कानूनी न्याय प्रणाली में एक डिजिटल तालाबंदी” पैदा कर दी है, जिससे वादियों और अधिवक्ताओं के लिए मामलों को ट्रैक करना, दैनिक आदेश देखना(Daily Orders), वाद सूचियों(Cause Lists) तक पहुंचना या निर्णय(Judgement) प्राप्त करना असंभव हो गया है। यह प्लेटफॉर्म पर पहुंच-योग्यता उपकरणों (accessibility tools) की पूर्ण अनुपस्थिति पर प्रकाश डालता है, जो वरिष्ठ नागरिकों, गैर-तकनीकी-प्रेमी व्यक्तियों, भाषाई अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए दुर्गम बाधाएं पैदा करता है, जिससे वे प्रभावी रूप से न्याय प्रणाली से अलग हो जाते हैं। यह याचिका इसकी तुलना भारत के सर्वोच्च न्यायालय(Supreme Court) की अत्यधिक सुलभ वेबसाइट से करती है, जिसे भी एनआईसी(NIC) द्वारा ही विकसित किया गया था। इसलिए, यह अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत अधिवक्ताओं के कानूनी पेशे का अभ्यास करने के अधिकार(Right to practice legal profession) का उल्लंघन कर रहा है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि पोर्टल की विफलता मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और यह हाल के सर्वोच्च न्यायालय(Supreme Court) के दृष्टांतों(precedents) पर बहुत अधिक निर्भर करती है। अमर जैन बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए, जनहित याचिका में यह तर्क दिया गया है कि “डिजिटल पहुंच का अधिकार”(Right to Digital Access) अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक आंतरिक घटक और एक समावेशी और न्यायसंगत समाज के लिए एक संवैधानिक अनिवार्यता है। इसके अलावा, गणेशकुमार राजेश्वरराव सेलुकर और अन्य बनाम महेंद्र भास्कर लिमये के फैसले पर भरोसा करते हुए, याचिका में कहा गया है कि उपभोक्ता मुकदमेबाजी में बाधा डालकर, पोर्टल की विफलता सहभागी लोकतंत्र की नींव को ही खत्म कर देती है। सहभागी लोकतंत्र संविधान की मूल विशेषताओं में से एक है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल एक संवैधानिक अधिकार बल्कि एक मानवाधिकार भी माना है।
मामले को व्यापक सबूतों द्वारा प्रमाणित किया गया है, जिसमें आरटीआई के स्पष्ट रूप से विरोधाभासी जवाब शामिल हैं। याचिका में बताया गया है कि जहां एनआईसी ने 11 जून 2025 की एक आरटीआई के जवाब में दावा किया था कि पोर्टल 1 जनवरी 2025 से “पूरी तरह से चालू और पूर्ण” था; और “कॉनफोनेट परियोजना बंद कर दी गई है।” वहीं चंडीगढ़ राज्य आयोग ने 1 जुलाई 2025 के अपने जवाब में स्वीकार किया कि “ई-जागृति पोर्टल प्रगति पर है” और “कॉनफोनेट परियोजना अभी भी चल रही है”। यह प्रशासनिक लापरवाही और खराब योजना को दर्शाता है।
याचिका के अनुसार, यह लापरवाही कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता है। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि खुद NICSI की आधिकारिक वेबसाइट पर एक सामान्य HTTPS/SSL सुरक्षा प्रमाणपत्र तक नहीं है। इस विफलता की गंभीरता सरकार के उस बयान से और बढ़ जाती है जिसमें उसने मार्च 2025 की एक प्रेस विज्ञप्ति में साइबर खतरों के उच्च जोखिम को स्वीकार करते हुए बताया था कि अकेले 2024 में भारत में 20 लाख से अधिक साइबर सुरक्षा की घटनाएं हुईं।
13 अक्टूबर 2025 को मामले का संज्ञान लेते हुए, माननीय मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। सरकार की ओर से पेश वकील को निर्देश प्राप्त करने और जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी 2026 को निर्धारित है।
याचिकाकर्ता शर्मा ने कहा,
“यह जनहित याचिका मेरे कानूनी करियर की शुरुआत है, जो मेरे कानूनी परिवार(Legal Community) और भारत के हर उपभोक्ता के मौलिक अधिकारों के लिए एक लड़ाई है। हम यह तर्क देते हैं कि एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था, जिसमें गंभीर खामियां हों, न्याय तक पहुंच में बाधा नहीं बन सकती।
आज के ‘डिजिटल इंडिया’ में, ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म ही आवश्यक कल्याणकारी योजनाओं और न्यायपालिका तक पहुँचने का प्राथमिक ज़रिया हैं। इन सेवाओं की पहुँच हर नागरिक तक होनी चाहिए और ये उन तकनीकी रुकावटों से मुक्त होनी चाहिए जो राष्ट्र की प्रगति में सीधे तौर पर बाधक हैं।
हम साइबर युद्ध के एक ऐसे युग में हैं, जहाँ डेटा अब नया तेल नहीं, बल्कि नया यूरेनियम बन चुका है। यह सुनिश्चित करना एक संवैधानिक दायित्व है कि हमारे देश का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पूर्ण रूप से सुरक्षित हो।
हमें विश्वास है कि माननीय न्यायालय जवाबदेही सुनिश्चित करेगा और एक ऐसी प्रणाली स्थापित करेगा जो समावेशिता, साइबर सुरक्षा और पारदर्शिता को प्रोत्साहित करती हो। हम न्यायालय से आग्रह करते हैं कि वह सभी वर्तमान और भविष्य की ई-गवर्नेंस परियोजनाओं के विकास, रखरखाव और सुरक्षा को विनियमित करने हेतु मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) की एक अनिवार्य रूपरेखा और समयबद्ध ढांचा तैयार करे।
